#वोट_चोरी की चर्चा एक बार फिर गर्म है। लेकिन क्या सच में हम उस 'असली' वोट चोरी को समझ रहे हैं, जिस पर अक्सर परदा डाल दिया जाता है? आइए, इस परतदार मुद्दे की पड़ताल करते हैं।
वोटिंग का मूल सिद्धांत और 'टारगेट ग्रुप':
हर राजनीतिक दल का लक्ष्य होता है कि वह जनता तक अपना संदेश पहुंचाए और उसे अपने पक्ष में करे। जिस जनसमूह तक यह संदेश पहुंचता है, वही उनका 'टारगेट ग्रुप' होता है। उसी के वोट को अपनी ओर मोड़ने की कोशिश की जाती है।
बीजेपी का मतदाता वर्ग और मीडिया की भूमिका:
भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के समर्थकों का उत्तरी भारत और शहरी इलाकों में एक बड़ा वर्ग है। इसका एक कारण यह है कि शहरी आबादी टीवी मीडिया, सोशल मीडिया और अखबारों के संपर्क में जल्दी आती है। यही कारण है कि इन माध्यमों से जुड़ी जनता का एक बड़ा हिस्सा बीजेपी के समर्थन में रहता है।
वोटर सूची में गड़बड़ी बनाम वोट चोरी का प्रश्न:
यह बात सर्वविदित है कि वोटर सूची या मतदाता सूची में कई प्रकार की गड़बड़ियां रहती हैं। संभव है कि सत्तापक्ष ने इन गड़बड़ियों का अपने लिए फायदा उठाने की कोशिश की हो। लेकिन, राहुल गांधी ने जब इस मुद्दे को उठाया, तो उन्होंने केवल सूचना नहीं दी, बल्कि सीधे वोट चोरी का आरोप लगा दिया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने वोट चोरी के सबूत पेश कर दिए हैं, जबकि हकीकत यह थी कि उन्होंने मतदाता सूची में विभिन्न प्रकार की गड़बड़ियों की ओर इशारा किया था। ये गड़बड़ियां वोटों की चोरी होने का सबूत नहीं थीं। (इस पर विस्तार से पहले भी लिखा जा चुका है - पूर्व लेख देखें)
राहुल गांधी द्वारा पेश किया गया एकमात्र 'सबूत' एक महिला का दो जगह वोट डालना था। यह भी स्पष्ट नहीं था कि उसने किसे वोट दिया था। उनके वीडियो को देखते ही यह स्पष्ट हो गया कि उन्होंने कोई ठोस सबूत नहीं दिया था, बल्कि मतदाता सूची की कमियों को ही 'वोट चोरी' का नाम दे दिया था।
'गोदी मीडिया' की प्रतिक्रिया और उसका प्रभाव:
यह पहले से ही अनुमान था कि इस आरोप को समर्थनपोषित मीडिया ('गोदी मीडिया') जोरदार तरीके से खारिज कर देगी और राहुल गांधी को भ्रमित साबित कर देगी। कुछ चैनलों के विश्लेषण से यह बात साफ हो गई कि इस मीडिया ने तार्किक ढंग से राहुल गांधी के वोट चोरी के दावों को गलत साबित कर दिया और समझाया कि यह मतदाता सूची में होने वाली गड़बड़ी का मामला है, वोट चोरी का सबूत नहीं।
चूंकि 'गोदी मीडिया' बीजेपी के समर्थकों द्वारा देखा जाता है, इसलिए बीजेपी के मतदाता कांग्रेस या इंडिया गठबंधन से प्रभावित नहीं होंगे। बल्कि, वे संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाने और झूठ बोलकर सूची की गलती को चोरी बताने के कारण कांग्रेस और उसके सहयोगियों से और दूर हो जाएंगे।
असली निशाना: कौन है इस प्रचार का टारगेट?
अब सवाल यह उठता है कि फिर कांग्रेस, राहुल गांधी और उनके समर्थक मीडिया (जैसे रवीश कुमार, पुण्य प्रसून वाजपेयी, सत्य हिंदी, द वायर, आशुतोष जैसे लोग) वोट चोरी का माहौल किसके मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बना रहे हैं?
बीजेपी के मौजूदा वोटर: वे इस प्रचार से प्रभावित नहीं होंगे, क्योंकि समर्थनपोषित मीडिया ने तर्कपूर्ण तरीके से वोट चोरी के दावों को राहुल गांधी का प्रचार और संवैधानिक संस्थाओं पर हमला साबित कर दिया है।
कांग्रेस/गठबंधन के मौजूदा वोटर: वे पहले से ही उनके साथ हैं।
तो फिर असली टारगेट कौन है? दलित-बहुजन।
जी हाँ, दलित-बहुजन समुदाय ही इस पूरे प्रचार का असली निशाना है। कैसे?
दलित-बहुजन लंबे समय से ईवीएम और वोट चोरी को मुद्दा बनाते रहे हैं।
अभी भी बड़ी संख्या में दलित एंटी-बीजेपी हैं, लेकिन वे कांग्रेस, सपा या इंडिया गठबंधन के साथ नहीं जुड़े हैं। अधिकांश बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) या अन्य बहुजन दलों से जुड़े हैं।
यही दलित-बहुजन लोग वोट चोरी के इस प्रचार की चपेट में आएंगे। यह वर्ग आमतौर पर 'गोदी मीडिया' नहीं देखता, बल्कि कांग्रेस समर्थक मीडिया के प्रभाव में है और पहले से ही ईवीएम व वोट चोरी के आरोपों से सहमत रहा है।
प्रचार और विरोध का नाटक: एक सोची-समझी रणनीति?
इसलिए, कांग्रेस द्वारा मतदाता सूची की गड़बड़ी को वोट चोरी का सबूत बताना और उसके बाद विरोध का नाटक करना, वास्तव में बीजेपी गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन से अलग दलों के मतदाताओं – विशेषकर दलित-बहुजन मतदाताओं के वोट हथियाने की एक बड़ी रणनीति प्रतीत होती है।
शायद इसीलिए मायावती जी लगातार कांग्रेस और सपा पर आरोप लगाती हैं कि ये दल बीजेपी के वोटर नहीं तोड़ते, बल्कि केवल दलित-बहुजनों के वोटर तोड़कर ही अपनी राजनीति चलाते हैं।
सूची में गड़बड़ी का दुरुपयोग: बहुजनों को निशाना बनाने का तरीका?
राहुल गांधी द्वारा मतदाता सूची की गड़बड़ी को वोट चोरी कहकर पेश करना, पूरे देश में बिहार जैसा SIR (special intensive revision) कराने का रास्ता भी साफ कर सकता है। यहां एक और पहलू ध्यान देने योग्य है:
बीजेपी कार्यकर्ता अक्सर 90-100 साल के बुजुर्ग मतदाताओं का भी आईडी कार्ड बनवाने में मदद करते हैं। शहरी क्षेत्रों के प्रभावशाली वर्ग (जैसे ब्राह्मण, बनिया) पूरी मदद करते हैं – व्हीलचेयर से लेकर कागजात बनवाने तक – ताकि उनके वोट कटने न पाएं। यानी वे अपने बुजुर्गों और दिव्यांगों के वोट भी सुरक्षित रखते हैं।
वहीं दूसरी ओर, गरीब बहुजन समुदाय के कई लोग होते हैं जिनके पास पहचान के दस्तावेज नहीं होते। उनके पास न अपना घर होता है, न पढ़ाई-लिखाई, न लोगों से कनेक्शन। उन्हें रोजी-रोटी के लिए दिहाड़ी पर जाना पड़ता है, या शराब जैसी बुरी लत में फंसे रहते हैं, या काम की तलाश में कुछ महीनों के लिए दूसरे शहरों में चले जाते हैं। ऐसे लोगों की एक ठीक-ठाक संख्या होती है।
इसका मतलब यह है कि कुछ हजार दलित-बहुजन मतदाताओं को हमेशा किसी न किसी बहाने मतदाता सूची से बाहर निकाला जा सकता है। इसलिए, यह पूरा घटनाक्रम इस ओर इशारा करता है कि 'वोटर लिस्ट की गड़बड़ी' के नाम पर कुछ बहुजनों को 'बांग्लादेशी' बताकर या अन्य बहानों से सूची से हटाया जा सकता है।
विरोध करने वालों पर लगेगा 'बी-टीम' का ठप्पा:
जो भी दल या नेता (जैसे बीएसपी या अन्य बहुजन दल) इस प्रचार का विरोध करेगा, उस पर 'बीजेपी की बी-टीम' होने का ठप्पा लगा दिया जाएगा। सभी तरफ चालाक लोग तैनात हैं।
निष्कर्ष:
यह विश्लेषण एक कड़वी वास्तविकता की ओर इशारा करता है। वोट चोरी का जो आरोप लगाया जा रहा है, उसकी आड़ में जो असली राजनीतिक खेल चल रहा है, वह विशेष रूप से दलित-बहुजन समुदाय को निशाने पर लेकर चलता है। मतदाता सूची में गड़बड़ियां एक वास्तविक समस्या है, लेकिन उसे 'वोट चोरी' के रूप में पेश करना एक सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा लगता है, जिसका उद्देश्य विशिष्ट वोट बैंक को प्रभावित करना है।
सच तो सामने आना ही चाहिए। सच को जन-जन तक पहुंचाना जरूरी है। साझा करें, चर्चा करें। #वोट_चोरी #कहीं_पे_निगाहें_कहीं_पे_निशाना #दलित_बहुजन #राजनीतिक_रणनीति वोट

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